आज मैं आपको ‘दाँत में कीड़ा लगना’  नामक रोग के बारे में बताऊंगा | वास्तव में दाँत में कीड़ा लगना एक बहुत ही गंभीर बीमारी है जो पूरी दुनिया में फैली हुई है | इस बीमारी के अनेक नाम है जैसे कि दाँत में कीड़ा लगना, दंत क्षय, dental decay, और dental caries. इस लेख के माध्यम से आप यह जानेंगे कि यह बीमारी किन-किन कारणों से होती है,  इसका क्या-क्या इलाज संभव है, तथा भविष्य में आपको, आपके बच्चों को या आपके प्रिय लोगों को यह बीमारी ना हो, इसके लिए आप क्या-क्या रोकथाम के उपाय कर सकते हैं |

इस बीमारी की मुख्य कारण कई प्रकार के कीटाणु होते हैं | इन कीटाणुओं के नाम स्ट्रैप्टॉकोक्कस मयूटांस और लेक्टोबेसिलाई हैं | हमारे खाने में  कार्बोहाइड्रेट अर्थात शर्करा होते हैं । यह शर्करा अर्थात चीनी कई प्रकार के होते हैं जिन्हें हम ग्लूकोस, फ्रुक्टोज, सुक्रोज, गैलेक्टोज, और माल्टोज  कहते हैं | जब आपके खाने में सुक्रोज शर्करा की मात्रा ज्यादा होती है तब स्ट्रैप्टॉकोक्कस मयूटांस और लेक्टोबेसिलाई कीटाणु उस शर्करा के साथ क्रिया करके एसिड अर्थात अम्ल उत्पन्न करते हैं | यह अम्ल दांतों में उपस्थित मिनरल्स को गला या धुला देते हैं |ये मिनरल्स दाँतों को मजबूती प्रदान करते हैं |इन मिनरल्स के दाँतों से निकल जाने के बाद दाँत अंदर से अत्यधिक कमजोर हो जाते हैं |और जब आप कोई कड़ी चीज, जैसे कि, अमरुद, खाते हैं, तो अचानक आपको लगता है कि आपके दाँतों में छेद या गड्ढा हो गया; और आप कहते हैं कि आपके दाँतों में अचानक कीड़ा लग गया | 

निष्कर्ष यह है कि दाँतों में कीड़ा लगने के कारक कीटाणु और सुक्रोज नाम की शर्करा होती है | यदि इनमें से कोई एक भी कारक अनुपस्थित रहता है तो आपके दांतों में कीड़ा नहीं लगेगा | इन बातों को आप ध्यान में रखकर यह लेख आगे पढ़ियेगा | 

दाँतों में कीड़ा लगने के लक्षण

दाँतों में कीड़ा लगने के निम्नलिखित लक्षण होते हैं |  इनमें से कोई एक या कई लक्षण एक व्यक्ति के मुंह में पाए जा सकते हैं | 

  • दाँतों के ऊपर सफेद छोटे-छोटे धब्बे दिखना |
  • दाँतों की सतह पर उपस्थित दरारों या छोटे छेदों में कालापन दिखना |
  • दाँतों में गड्ढे होना |
  • दाँतों में ठंडा या गर्म लगना |
  • दाँतों में खट्टा मीठा लगना |
  • दाँतों में दर्द होना | 

उपरोक्त वर्णित लक्षण दाँतों के अन्य रोगों में भी दिखाई दे सकते हैं, जैसे कि जिंजिवाइटिस या पीरियडोनटाइटिस या जिंजाइवल रिसेशन | उपरोक्त वर्णित लक्षणों का वर्णन एक सामान्य व्यक्ति के ज्ञानवर्धक के उद्देश्य से किया गया है ना कि रोग की पहचान एवं उसके इलाज के लिए | अतः यह आवश्यक है कि आप अपने रोगों की पहचान एवं उसके इलाज के लिए किसी डेंटिस्ट से संपर्क करें | 

कृपया नीचे दिए गए चित्रों को ध्यान पूर्वक देखें | इन चित्रों में दाँतों में कीड़े लगने की विभिन्न अवस्थाओं को दिखाया गया है।

प्राथमिक चरण  में, निचले दाढ़ के दाँतों में, काले घेरे में, दंत क्षय दिखाती छवि | अग्रिम चरण में, ऊपरी प्रीमोलर दांत में, काले घेरे में, दंत क्षय दिखाता हुआ चित्र | बहुत अग्रिम चरण में, दंत क्षय से प्रभावित दांत | इसके उपचार में अग्रिम तौर-तरीके शामिल होंगे |

उपचार के तरीके

जब दातों में कीड़े लग जाते हैं तो कीड़े लगने की स्टेज के अनुसार उपचार के तरीके का निर्धारण किया जाता है। इन उपचारों के अंतर्गत दांतों में फिलिंग की जाती है । दांतो की फिलिंग कई प्रकार के पदार्थों से की जाती है उदाहरण स्वरूप, कंपोजिट फीलिंग, सिल्वर फिलिंग, या ग्लास आयनोमर फिलिंग ।

कंपोजिट फिलिंग का रंग दांतो के रंग के समान होता है । अतः कंपोजिट फिलिंग सामान्यतः सामने के दांतों में की जाती है । सिल्वर फिलिंग का रंग चांदी से मिलता-जुलता है तथा यह फिलिंग काफी मजबूत होती है । इसलिए सिल्वर फिलिंग पीछे के दातों में की जाती है|ग्लास आयनोमर पदार्थ का उपयोग बच्चों के दातों में फिलिंग करने के लिए किया जाता है। ग्लास आयनोमर फिलिंग का रंग दांतो के रंग से मिलता-जुलता है । कंपोजिट और ग्लास आयनोमर फीलिंग का जीवन काल सिल्वर फिलिंग की तुलना में कम होता है ।

दांत में कीड़े लगने की एडवांस स्टेज में कीड़े दांत के अंदर उपस्थित पल्प चेंबर के अंदर पहुंच जाते हैं । इस अवस्था में मात्र फिलिंग से इलाज नहीं हो सकता है । इस अवस्था में  फिलिंग करने से पहले उस दांत का रूट कैनाल ट्रीटमेंट करना पड़ता है । अतः यदि दांत में काफी दिनों से कीड़ा लगा हो और उसमें उपस्थित गड्ढा काफी बड़ा हो गया हो, तो यह पता करने के लिए कि कीड़ा पल्प चेंबर तक नहीं पहुंच गया है, दांत का एक्सरे करना पड़ता है । एक्सरे के द्वारा ही यह पता चल सकता है कि दांत में सिर्फ फीलिंग करनी पड़ेगी या उससे पहले उस दांत का रूट कैनाल ट्रीटमेंट करना पड़ेगा । रूट कैनाल ट्रीटमेंट के बारे में जानकारी लेने के लिए कृपया दिए गए लिंक पर क्लिक करें ।

दांतों में कीड़ा लगने के रोग की रोकथाम के उपाय 

जैसा कि इस लेख के प्रारंभ में मैंने आपको बताया था कि इस रोग के कारक कीटाणु और शर्करा होते हैं । इन दोनों के प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न अम्ल दांतों को नुकसान पहुंचा कर दांतों में गड्ढे उत्पन्न करते हैं । यदि हम कीटाणु या शर्करा या दोनों को मुंह में से निकाल दें तो दातों में कीड़ा नहीं लगेगा।

एक अन्य उपाय यह है की दातों में उपस्थित मिनरल, जो कि दांतो को कठोर बनाते हैं, को ही और ज्यादा मजबूत कर दिया जाए, जिससे कि उसकी अम्ल में घुलनशीलता कम हो जाए। 

अतः दांतों में कीड़े ना लगे इसके लिए हमें प्रतिदिन सुबह नाश्ते के बाद एवं रात में खाना खाने के बाद दांतो को एक अच्छे टूथपेस्ट और सॉफ्ट टूथब्रश की सहायता से साफ करना चाहिए । इस विधि के द्वारा हम मुंह में उपस्थित कीटाणुओं की मात्रा को लगातार कम से कम स्तर पर रख सकते हैं ।  इसके अतिरिक्त हमें सुक्रोज शर्करा को बार-बार नहीं खाना चाहिए । सुक्रोज शर्करा टॉफी और चॉकलेट में बहुत अधिक मात्रा में प्रयोग की जाती है । अतः यदि हमें या हमारे बच्चों को चॉकलेट या टॉफी खाना पसंद है तो हमें या हमारे बच्चों को टॉफी और चॉकलेट की ज्यादा मात्रा एक ही बार में खानी चाहिए, ना कि थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बार-बार । एक बार ये चीजें खा लेने के बाद मुंह को फिर से टूथब्रश और पेस्ट की सहायता से साफ कर लेना चाहिए।

दांतों में उपस्थित मिनरल्स को मजबूत करने के लिए हमें फ्लोराइड वाला माउथवॉश करना चाहिए । बच्चों के दांतो को कठोर बनाने के लिए डेंटिस्ट फ्लोराइड जेल का इस्तेमाल करते हैं । अतः अपने बच्चों के दांतो की सुरक्षा के लिए आप अपने डेंटिस्ट से सलाह ले सकते हैं। 

इस लेख का अंत मैं यहीं पर करना चाहता हूँ । क्यों कि, “दांतों में कीड़ा लगने” वाले रोग की इतनी जानकारी एक सामान्य व्यक्ति के लिए पर्याप्त है । यदि आप इससे ज्यादा जानकारी चाहते हैं तो इस वेबसाइट पर उपस्थित अन्य लेख पढ़ सकते हैं । यदि आपको कोई खास जानकारी चाहिए, तो अपना प्रश्न, कमेंट बॉक्स में लिखकर, हमें भेज सकते हैं ।

यह लेख, डॉ. अजय मोहन सिंह द्वारा उन व्यक्तियों के लिए लिखा गया है, जो दंत क्षय के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं

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